Subscribe

RSS Feed (xml)

Powered By

Skin Design:
Free Blogger Skins

Powered by Blogger

Wednesday 27 March 2013


होलिका दहन करके घर लौटते समय होली के माहौल ने अपना असर दिखाना प्रारम्भ कर दिया। नतीजा जो निकला वो आपके सामने हाजिर है :


हल्ला गुल्ला कुछ न हुआ, फिर होली क्या ?
बौराया गर ना बबुआ, फिर होली क्या ?

रंग डाला है पोर पोर इस तन का तो 
मन को रत्ती भर न छुआ, फिर होली क्या ?

अपनों से यदि गले नहीं मिल पाए तुम 
मिली बुजुर्गों की न दुआ, फिर होली क्या ?

खींच तान कर ओढ़ रखी हैं मुस्कानें 
भीतर बुझा बुझा मनुआ, फिर होली क्या ?

सब कुछ दाँव लगा पर प्रीत निभा प्यारे 
इतना भी खेला न जुआ, फिर होली क्या ?

शीश झुका कर पीछे पीछे चलते हो 
बने न जीवन में अगुआ, फिर होली क्या ?

धूप उम्र की ढलने आयी "जोगेश्वर"
बने रहे अब भी ललुआ, फिर होली क्या ?

Friday 8 July 2011

तुम्हारी बेरुखी किसको बताएं

पूरे सात माह हो गए मेरे ब्लॉग को उपेक्षा के सागर में गोते लगाते हुए. ईश्वर ऐसे बुरे दिन किसी ब्लॉग को नहीं दिखाए. लीजिये पेश है मेरे अपने ब्लॉग के प्रति मेरी इस बेरुखी को समर्पित एक ग़ज़ल. देखते हैं कितने महानुभावों तक पहुँचती है यह खबर कि मेरे ब्लॉग ने करवट ली है.

तुम्हारी बेरुखी किसको बताएं
छुपा कर आंसुओं को मुस्कुराएं

संभल कर खोलता हूँ मैं जुबां को
उजागर राज़ अपने हो न जाएँ

तुम्हारे साथ चाहूँ वन-भ्रमण मैं
मगर डर है कहीं हम खो न जाएँ

तुम्हारे साथ मुश्किल एक पल भी
जन्म का साथ केवल कल्पनाएँ

नज़र के सामने तस्वीर तेरी
कभी जब बेखुदी में सिर झुकायें

मुझे वो आजमा कर बोलते हैं
चलो फिर से इसी को आजमायें

तुझे भी याद है क्या ज़ुल्म तेरे
मुझे तो याद है अपनी खताएं

गुजारिश है कि किश्तों में नहीं दो
सुना दो थोक में सारी सजायें

रखी है मांग "जोगेश्वर" ज़रा सी
मुझे मेरी ग़ज़ल वो खुद सुनाएं

Monday 6 December 2010

क्रिया की प्रतिक्रिया

राजस्थान प्रशासनिक सेवा के १९८९ बैच के अधिकारी हैं श्री अश्विनी शर्मा. फेसबुक पर मेरे मित्र हैं.
कल उन्हों ने मेरी वाल पर एक ग़ज़ल चिपकाई और प्रतिक्रिया माँगी.
ये रही उनकी ग़ज़ल :

दर्द जब बेजुबान होता है
जिस्म पूरा बयान होता है

आदमी किश्त किश्त जीता है
सब्र का इम्तिहान होता है

कौन सी हद औ किस के पैमाने
एक सपना जवान होता है

शख्श एक हौसले से जीता है
आँख में असमान होता है

वक़्त है आम खास क्या होगा
सिर्फ एक दास्तान होता है

जुगनुओं को करीब से देखो
इस चमक में जहान होता है 


और ये रही क्रिया की प्रतिक्रिया :

आदमी बदगुमान होता है 
हर शिखर का ढलान होता है 

दर्द जब भी जवान होता है 
सब्र का इम्तेहान होता है 

घाव दिल पर लगे बहुत गहरा 
शक्ल पर कब निशान होता है 

हो न अहसास से भरा दिल तो 
जिस्म खाली मकान होता है 

खूब हो माल ज़र जमीं दौलत 
कौन इनसे महान होता है 

ख्वाब लाखों तबाह होते हैं 
जिस्म जब भी दुकान होता है 

खुशनसीबी अगर हमारी हो 
आदमी से मिलान होता है 

ढूँढते है सभी कमी मुझ में 
कब गलत आसमान होता है 

है तभी कामयाब "जोगेश्वर"
तू अगर मेहरबान होता है 
 
आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.

Sunday 21 November 2010

सुरमन

मेरे एक मित्र हैं सुरेन्द्र चतुर्वेदी. पेशे से पत्रकार. ८ मई १९९५ को उनकी शादी समारोह में मैं उपस्थित था. उनकी पत्नी मनन को देखते ही मुझे लगा कि ये लड़की कुछ अलग है. जितनी चंचल उतनी ही संजीदा. जितनी संवेदनशील उतनी ही कर्मठ. जितनी दयालु उतनी ही कठोर. जितनी सक्रिय उतनी ही सतर्क. मैंने उसे अपनी मुंहबोली बहिन बना लिया. आगे जा कर उसने अपने इन गुणों को अक्षरशः प्रमाणित किया.

सन २००२ में अचानक मुझे पता चला कि तीन बच्चों की मां बन चुकी मनन एक बच्ची (उम्र २ वर्ष) को अपने घर ले आयी है. वह बच्ची किसी भिखारिन के पास थी जो उससे भीख मंगवाती थी और जब वह अत्यधिक बीमार हो गयी तो उसे फुटपाथ पर छोड़ गयी. मनन ने उस बच्ची की सेवा की. वह ठीक हो गयी. उसका नाम रखा गौरी जो अभी आदर्श विद्या मंदिर में पढ़ रही है.
गौरी से जो सिलसिला शुरू हुआ वह आगे भी जारी रहा. गौरी जैसे ही परित्यक्त, पीड़ित, प्रताड़ित बच्चों को वह अपने घर में आश्रय देती गयी. बहुत बाधाएं आयी. अपनों का और पड़ोसियों का विरोध भी सहना पडा. पर इस कार्य में उनके पति सुरेन्द्र ने पूरा सहयोग किया. इस कार्य को विधिसम्मत तरीके से चलाने की सारी कवायद उन्हों ने ही की.
तमाम बाधाओं, अवरोधों, कठिनाइयों और मुसीबतों के बावजूद सुरेन्द्र का "सुर" और मनन का "मन" मिल कर बना "सुरमन" संस्थान उन बच्चों को अपना बनाने के भागीरथी प्रयत्न में लगा है जिनका इस संसार में कोई नहीं है. आज "सुरमन" ६६ बच्चों का आशियाना है और सुरेन्द्र-मनन स्वयं को उन ६६ बच्चों के पिता एवं माता कहते हुए अघाते नहीं हैं. मजे की बात ये कि किसी भी अनजान व्यक्ति के लिए यह जानना बहुत मुश्किल है कि उनमे से वे तीन बच्चे कौन से हैं जो मनन की कोख से पैदा हुए हैं.

गत १७ नवम्बर को मनन का जन्मदिन था. मैंने बधाई दी तो बोली मेरी गिफ्ट ? मैंने कहा क्या चाहिए ? बोली एक ग़ज़ल ऐसी जिसे पढ़ कर मैं यह अनुमान लगा सकूं कि मेरा भाई मुझे कितना समझ पाया है.
मांग साधारण नहीं थी. पर बहिन ने मांग की है तो पूरी तो करनी ही थी. जो ग़ज़ल मैंने मनन के लिए लिखी वह हू-ब-हू आप की सेवा में प्रस्तुत है.

जमीं पर राज तेरा हो हुकूमत में गगन तेरा 
चमेली से गुलाबों से सदा महके चमन तेरा 

मुसीबत से तेरा लड़ना, झगड़ना हर बुराई से 
क़यामत तक रखे कायम खुदा ये बांकपन तेरा 

जनमते ही जिसे छोड़ा, नसीबों ने जिसे मारा 
उन्हें भी छाँव ममता की मिले हर पल जतन तेरा 

न अपना है तेरा अपना, न कोई भी पराया है 
खुदी तूने मिटा डाली न तन तेरा न मन तेरा 

न फुर्सत है न आलस है न नफ़रत को जगह कोई 
लुटाने को मुहब्बत ही हुआ है आगमन तेरा 

सुरों का इन्द्र जब पहुंचा मनन के द्वार पर आकर 
सजा सुरमन बढ़ा सुरमन बना सुरमन वतन तेरा 

चिरंतन सोच सेवा की लिए चलना निरंतर तू 
करेंगे सब मदद तेरी सुनेंगे सब कथन तेरा 


तुम्हारे जन्मदिन पर आज "जोगेश्वर" दुआ मांगे 
रहेगा नाम हर पल ही बुलंदी पर "मनन" तेरा 

Saturday 6 November 2010

अमीरी में रखा क्या है

पूरे तीन महीने बाद आज बिचारे ब्लॉग की सुध ली है. जबसे बैरन फेस बुक सौतन बन कर खड़ी हो गयी है तब से हमारा ब्लॉग बिचारा हो गया है. वैसे भी नेट पर बैठने के लिए ज्यादा समय तो मिलता नहीं. जो मिलता है वो भी सारा फेस बुक की भेंट चढ़ जाता है. निश्चित ही फेस बुक ज्यादा बड़ा प्लेटफोर्म है जहां ज्यादा लोगों से संपर्क और ज्यादा लोगों तक पहुँच बन सकती है. और राजनीति से जुड़े लोगों के लिए ज्यादा लोगों से जुड़ने का लोभ संवरण कर पाना ज़रा मुश्किल होता है. ज्यादा लोगों से जुड़ाव हमारे लिए नशे से कम नहीं होता है. इसलिए................... मुझको यारों माफ़ करना मैं नशे में हूँ !

खैर....... ! सबसे पहले तो इस ब्लॉग के सम्माननीय पाठकों और प्रशंसकों को दिवाली की हार्दिक शुभ कामनाएं ! और अब आनंद लीजिये एक ताज़ा ग़ज़ल का !

अमीरी में रखा क्या है 
ग़रीबी में बुरा क्या है 

कभी पूछो फकीरों से 
फकीरी में मज़ा क्या है 

तुझे भी एक दिन जाना 
बचा अब रास्ता क्या है 

चला चल जानिबे मंजिल 
मुसाफिर सोचता क्या है 

पता क्या है हवाओं को 
दिए का हौसला क्या है 

तुझे मिलना बहुत चाहूँ 
बता तेरा पता क्या है 

समझना है बहुत मुश्किल 
खता क्या थी सज़ा क्या है 

फिरे क्यों पूछता सब को 
मुक़द्दर में लिखा क्या है 

बताये कौन बन्दे को 
खुदाओं की रज़ा क्या है 

अहमियत खुद समझ अपनी 
बिना तेरे खुदा क्या है 

कभी तो सोच "जोगेश्वर" 
गया क्या है बचा क्या है 

Wednesday 4 August 2010

कश्ती है समंदर में

मेरी १०० वीं पोस्ट पर एक टिप्पणी आयी थी "अच्छा भजन है". इस टिप्पणी पर मुझे ख़याल आया हिंदी के अनेक भक्तकवियों ने अपने प्रभु को रिझाने के लिए "ग़ज़ल" विधा का भरपूर उपयोग किया है. ब्रह्मानंद का यह प्रसिद्द भजन तो सब की जुबान पर होगा ही :"मुझे है काम ईश्वर से जगत रूठे तो रुठन दे".

"धरी सिर पाप की मटकी, मेरे गुरुदेव ने झटकी,
वो ब्रह्मानंद ने पटकी, अगर फूटे तो फूटन दे"
 
इस कड़ी में अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं. सूफी कलाम तो सारा का सारा ग़ज़ल-मय ही है. नवीनतम उदाहरण के रूप में आस्था और संस्कार जैसे धार्मिक टीवी चेनलों में भजन गाते हुए श्री विनोदजी अग्रवाल को अक्सर देखा-सुना जा सकता है. उनके द्वारा गाये जा रहे ज्यादातर भजन ग़ज़ल ही होते हैं. इसी कड़ी में लीजिये प्रस्तुत है एक भजन-कम-ग़ज़ल :

कश्ती है समंदर में और दूर किनारा है 
तू पार उतारेगा, तुझको ही पुकारा है 

लाखों हैं पाप मेरे, कोटि अपराध मेरे 
गलती की गठरी है, भूलों का पिटारा है 

झूठे हैं सहारे सब, मक्कार फरेबी सब,
सच्चा इक नाम तेरा, सच्चा तू सहारा है 

ये सिर उन चरणों पर, वो हाथ मेरे सिर पर,
क्या खूब इनायत है, क्या खूब नजारा है 

हर पल जो बीता है "जोगेश्वर" जीता है 
बेशक है नाम मेरा, पर काम तुम्हारा है 

बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर आना हुआ है. आपकी टिप्पणियों से ही पता चल पायेगा कि ग़ज़ल का यह रूप पसंद आया या नहीं ?
 

Monday 14 June 2010

त्रिवेणी संगम

जालोर में मेरे दो साहित्यिक मित्र हैं. एक अचलेश्वर "आनंद" दूसरे परमानंद भट्ट. एक "आनंद" तो दूसरा "परमानंद" ! अब समझे आप मेरे सदा आनंदित रहने का रहस्य ? हम तीनों ग़ज़लों के रसिया. ग़ज़ल कहना, पढ़ना, सुनना और सुनाना हम तीनों को बहुत अच्छा लगता है. और एक रहस्य की बात बताऊँ ? ग़ज़ल के कथ्य और विषयवस्तु के स्तर पर हम तीनों लगभग एक ही धरातल पर खड़े नज़र आते हैं.
हम तीनों के पास कुछ गिनी-चुनी हल्दी की गांठें थी जिनके बलबूते हम अपनी अपनी परचून की दुकानें चला रहे थे. ४-५ वर्ष पूर्व हम तीनों ने मिलकर एक ग़ज़ल संग्रह छपवाने का विचार किया क्यों कि हम तीनों की कुल ग़ज़लें मिला कर मुश्किल से एक संग्रह के लायक सामग्री बन पा रही थी. लेकिन हम तीनों में एक और समानता है आलस्य जिसके कारण वह कार्य लंबित होता गया. इसी दौरान मेरी लोटरी निकल गयी और मेरे अकेले के पास इतनी ग़ज़लें हो गयी कि एक संग्रह प्रकाशित हो सके. मैं अपने मित्रों को अकेला छोड़ कर आगे निकल गया. वह अपराधबोध मुझे आज तक सालता रहा.
पिछले सप्ताह परमानंदजी ने मुझे एक मिसरा दे कर कहा अपन इस पर ग़ज़ल कहने का प्रयास करते हैं. तीन-चार दिनों में हम दोनों की ग़ज़लें तैयार हो गयी. तभी मैंने कहा अचलेश्वरजी को भी शामिल किया जा सके तो मज़ा आ जाएगा और अपनी त्रिवेणी संगम की मनोकामना पूरी हो जायेगी. तीन दिन से मैं अचलेश्वरजी से "आनंद" प्राप्त करने का प्रयास और प्रतीक्षा कर रहा था जो आज जा कर पूरी हुयी.
मिसरा इस प्रकार है : "ज़िंदगी अंदाज़ तेरा शायराना चाहिए"
मिसरा किसका है ये हमें पता नहीं. किसीका है भी या नहीं यह भी हम नहीं जानते. मेरे पास दो अच्छे जानकारों के मोबाईल नंबर थे.  एक श्री तिलक राज कपूर और दूसरे श्री सतपाल भाटिया. दोनों से पूछ लिया पर वे भी नहीं बता पाए. नेट पर खोजा तो बशीर बद्र साहब का एक शेर मिला
"आख़री हिचकी तेरे शानों पे आये 
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ"
हमने अपनी खोज को यहीं विराम दे दिया यह मान कर कि यह मिसरा भाई परमानंदजी के दिमाग की ही उपज है. फिर भी हमारे मारवाड़ी व्यापारियों की भाषा में कहूं तो "भूल-चूक, लेनी-देनी"
इस छोटी सी भूमिका के बाद पेश है तीनों ग़ज़लें.
स्वाभाविक रूप से पहले मैं:


दर्द गाना और पीड़ा गुनगुनाना चाहिए 
ज़िंदगी अंदाज़ तेरा शायराना चाहिए 

प्यार है तुझसे मुझे यह कह दिया काफी नहीं 
प्यार है तो आँख से भी छलछलाना चाहिए 


खोल कर आँखें उसे मत ढूंढिए चारों तरफ
यार के दीदार को बस सर झुकाना चाहिए 


कौन चिड़िया पेड़ कैसा और जंगल कौन सा
आँख चिड़िया की दिखे ऐसा निशाना चाहिए 


एक छप्पर गाँव के बरगद तले मैं डाल दूं 
उम्र के पिछले पहर कोई ठिकाना चाहिए 


धूप मेरे साथ में है दूर तक बारिश नहीं 
गर नहाना है पसीने में नहाना चाहिए 


उम्र भर बैठे रहे खामोश "जोगेश्वर" वहाँ 
बात की शुरुआत का कुछ तो बहाना चाहिए 

अब अचलेश्वर "आनंद"

गम हरिक बातिन खुशी हर जाहिराना चाहिए 
ज़िंदगी अंदाज़ तेरा शायराना चाहिए 


किसलिए मायूस गुमसुम किसलिए खामोश हैं 
इस चमन की बुलबुलों को चहचहाना चाहिए 


हक लिखा रज्जाक ने जिस रिज्क पर इंसान का 
नेकनामी से मिले वो आब-ओ-दाना चाहिए 


आकिलों का जोर बस इल्म-ओ-हुनर तक रह गया 
शायरी में दिल की तबियत आशिकाना चाहिए 


जिसको सुन कर खुशबू-ए-गुल खिल उठे ए हमनशीं
मन मिला कर महक में यूं गुनगुनाना चाहिए 


जिसकी हर दिल पर हुकूमत ऐ दिल-ए-नादान सुन 
अपनी हर धड़कन से उसमे दिल लगाना चाहिए 


"आनंद" के अशआर-ओ-आदाब उन सब के लिए
मर्द-ए-कामिल हर क़दम पर मुस्कुराना चाहिए


और अंत में परमानंद भट्ट 

मीर ग़ालिब-ओ-ज़फर का वो ज़माना चाहिए 
ज़िंदगी अंदाज़ तेरा शायराना चाहिए 

ख्वाब में भी क्यों खुदा से मांगिये ऊंचा मकान
चंद तिनकों का सही पर आशियाना चाहिए 


उम्र भर सुनते रहे हम ज़िंदगी की झिड़कियां
थक चुके सुन-सुन हमें अब सर उठाना चाहिए 


वो हमारी दास्ताँ जब भी सुनेगा गौर से 
अश्क उसकी आँख में तब झिलमिलाना चाहिए 


दूरियों नज़दीकियों के मायने कुछ भी नहीं 
जब कभी एकांत हो वो याद आना चाहिए 


उतर कर आकाश से कहने लगी किरणें हमें 
किसलिए अब दीप घर में टिमटिमाना चाहिए 


सहज में चर्चा करे जो वेद और वेदान्त की 
फिर कबीरा-सा हमें फक्कड़ दिवाना चाहिए 


जिस्म का आनंद यारों कुछ पलों का खेल है 
रूह का आनंद "परमानंद" पाना चाहिए 


अब आप समझ गए होंगे मैंने ग़ज़लों को इसी क्रम में क्यों प्रस्तुत किया ? आप लोग भी मेरी राय से अवश्य सहमत होंगे. मेरे दोनों मित्रों की ग़ज़लें मुझसे बेहतर हैं.
इस त्रिवेणी संगम पर आप की राय  की प्रतीक्षा रहेगी.